बाहर वाली क़ब्रें

कमल जीत सिंह

बाहर वाली क़ब्रें
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सारांश

‘‘ये पुराने जमाने के राजा-महाराजा अपने किलों के मुख्य द्वार का रास्ता ऐसा टेढ़ा-मेढ़ा क्यों बनाते थे ? आजकल तो प्रवेश के रास्ते कितने सुन्दर, चौड़े और सीधे होते हैं।’’ ‘‘ इस एन्टरेंस, मेरा मतलब है, ...
Puja Bhatnagar
बहुत प्रशंसनीय रचना।
राहुल दुबे सागर
bhut he achhi kahani hai padhkar bhut achha lga
Nahid Khan
bahut badhiya ji... bahut khoobsurat or realistic...
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