बाहर वाली क़ब्रें

कमल जीत सिंह

बाहर वाली क़ब्रें
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सारांश

‘‘ये पुराने जमाने के राजा-महाराजा अपने किलों के मुख्य द्वार का रास्ता ऐसा टेढ़ा-मेढ़ा क्यों बनाते थे ? आजकल तो प्रवेश के रास्ते कितने सुन्दर, चौड़े और सीधे होते हैं।’’ ‘‘ इस एन्टरेंस, मेरा मतलब है, ...
Shourabh Prabhat
उत्तम रचना....कृपया मेरी रचनाओं पर भी टिप्पणी दें
anil yadav
waah sir kya story hai mazaa aa gya
Gajju Singh
very nice story sahib ji
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