बागीचे की चीखें

ब्रजेंद्रनाथ मिश्रा

बागीचे की चीखें
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सारांश

नीलू से भाभी ने पूछा, "कोई तकलीफ तो नहीं है।" नीलू ने कहा था, "यही तो तकलीफ है भाभी की कोई तकलीफ नहीं है।" फिर भी नीलू रोये जा रही थी। कौन सा दर्द था जो समन्दर बनकर आंखों से निकलते हुए थमने का नाम ही नहीं ले रहा था।
Anju Dixit
बहुत खूब
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Uday Pratap Srivastava
एक ह्रदय स्पर्शी कहानी
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Geeta Ved
very interested story
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Rishabh Shukla
very nice
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डॉ अर्चना शर्मा
मार्मिक कहानी
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Ravi Kashyap Rajandar Kashysp
awesome
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ललित बदरेल
आपकी मार्मिक कृति को साधुवाद
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मधुलिका साहू
सुंदर अभिव्यक्ति। कथा पर पकड़ मजबूत है ।
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aradhana
nice
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Santwana Mishra
अच्छी कहानी है
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