बहकने की जगह सम्भले

Satya Prakash

बहकने की जगह सम्भले
(10)
पाठक संख्या − 45
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सारांश

सम्हलने की जगह बहके,         बहकने की जगह सम्भले। जमाना ये बदलते हैं         मगर खुद को न ये बदले। छलांगे इनकी ऊंची हैं         कि छूलें चांद तारों को,  बड़े नादां मुसाफिर हैं          कि गिर ...
प्रीती वर्मा
waah...bhai ji...bhut khub. beautiful creation 🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻✍️✍️✍️✍️💐💐💐
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Kalyani Jha
बहुत ही लाजबाव रचना 👌👌
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Krishna Khandelwal singla
Very nice ji
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ज्योति धाकड़
बहुत ही उम्दा रचना, शानदार।
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Nittu kumar
जिस भी सन्दर्भ में पढ़ें उसी में लाजवाब अर्थ देती कविता👌👌👌👌👌 उन्हें जीना कहाँ आया,जो मरते ही नहीं पहले... 👌👌👌👌👌 हैं नामंजूर वो बातें..... सारी पँक्तियाँ लाजवाब👏👏👏👏 निसन्देह उत्कृष्ट सृजन🙏
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saumya pandey
बेजोड़ कविता होती हैं आपकी
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मीनाक्षी भारद्वाज
bhut badiya 🙏🙏👍
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दिव्या भट्ट
बढ़िया 👌
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Tanuja
सुंदर
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पूनम रानी
nice
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