बलिराम कौ मोड़ा

कृत्तिका मिश्रा

बलिराम कौ मोड़ा
(33)
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सारांश

"छाया जी, ये रहा आपका पैकेट !" कहते हुए शुक्ला जी कागजों के भारी भरकम छ: पुलिन्दे छाया की मेज पर धड़ाम से पटक गए. वे जानते हैं छाया चौंक जाती है फ़िर भी, शायद उसका सिहरना देखने के लिए ही वे हर बार ऐसा ...
Santosh Vidyadhar Mishra
कहानी बहुत ही मजेदार ढ़ग से लिखी है । ग्रामीण स्कूलो मे शिक्षा का आज भी ऐसा ही हाल है ।
Amar Singh
बढ़िया कहानी
इरा जौहरी
सुन्दर थार्थ सृजन
Asha Shukla
ankhon ke samne jaise gaanv jeevit ho utha kamal ka lekhan hai ati uttam krpya meri kahani ,,unhen yad hai,, bhi padhen
pradeep Yadav
interesting story thanks Kritikajee
Achal Yadav
सटीक वर्डन है आज की व्यवस्था पर
Satendra Singh
बहुत बढ़िया कहानी
ashutosh kumar
bahut badhiya.. sab jagah ka yahi haal hai..
Lalit Negi
यथार्थपरक लेखन, पढने पर न जाने क्यों अपने गाँव के विद्यालय की तस्वीर मन में उभरती रही
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