फ्रेम

प्रज्ञा

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सारांश

‘‘आज शाम पांच बजे आई. एन. ए.... दिल्ली हाट’’‘‘ओ.के.’’‘‘ठीक पांच’’‘‘ओ.के.’’रावी और जतिन के बीच दिन भर में न जाने कितने मैसेजेस का आदान-प्रदान होता रहता है। कहने को दोनों एक ही जगह काम करते हैं पर कितने
Manu Prabhakar
प्रज्ञा मेम कहानी की शुरुआत बहुत अच्छी क्योंकि बहुतों की नजरें जमाये होने के बाद भी प्रेम मजबूत था पर अंत लाचार!!!! कारण समझ नहीं आया।
डॉ. ए सतीश
क्या अद्बुत कहानी है मैम नमन लेखनी को
पिया सिंह
दिल को छू गई आपकी रचना।हमारे समाज का असली चेहरा बड़ी सादगी से पेस किया है अपने।
Nidhi Gupta
बहुत सुंदर कहानी। परंतु अंत दिल को झकझोरने वाला था। अंत में पात्रों के साथ इंसाफ नही किया ।
Sonia Pratibha
बहुत सुंदर कहानी कर पर अंत अखर रहा है साधुवाद
Kamlesh Budlakoti
tactful literature....top class
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