फिर कभी

कविता वर्मा

फिर कभी
(124)
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सारांश

सुधीश का बचपन आम मध्यम वर्गीय बचपन था जरूरतों को चादर के मुताबिक समेट लेने में ही सुख ढूंढने वाला , मम्मी पापा को चुपके से अपनी जरूरतों को बेकार का खर्चा कह नज़र अंदाज़ करने वाला, वक्त जरूरत के लिए कुछ बचा कर रखने के लिए अपनी ख्वाहिशों को 'फिर कभी' के लिए स्थगित करने वाला बचपन। आत्म संतोष का पाठ पढ़ते पढ़ते भी पता नहीं कब सुधीश के मन में एक ख्वाहिश ने जन्म ले लिया। वह पापा की सीमित क्षमता जानता था इसलिए उसे मन के एक कोने में दबा कर रखे रहा 'फिर कभी ' के लिए।
Somesh Ârmo
👌👌👌👌👌
Aashu Jain
अच्छी रचना... 👌
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Akela musafir ...🚶
badiya khanai ti shukriya apka
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Pragya Shrivastava
very nice
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Anuradha Srivastava
madhyamvargiye khwaishown ka sajeev chitran
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Mahendra Singh
हम लोगों के जीवन से बहुत ही मिलती जुलती है। साधुवाद।
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Amit Saini
बिल्कुल सही लिखा।।।पति परिवार की खुशी में , अपने लिए जीना भूल जाता है
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RAJESH KUMAR SAINI
bahut bahut achchha likha aapne. fir kabhi kab aata hai ,, koi bhi nhi janta. mai bhi nhi janta isliye aaj abhi kuch kaam kar lene chahiye.
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