फिर कभी

कविता वर्मा

फिर कभी
(110)
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सारांश

सुधीश का बचपन आम मध्यम वर्गीय बचपन था जरूरतों को चादर के मुताबिक समेट लेने में ही सुख ढूंढने वाला , मम्मी पापा को चुपके से अपनी जरूरतों को बेकार का खर्चा कह नज़र अंदाज़ करने वाला, वक्त जरूरत के लिए कुछ बचा कर रखने के लिए अपनी ख्वाहिशों को 'फिर कभी' के लिए स्थगित करने वाला बचपन। आत्म संतोष का पाठ पढ़ते पढ़ते भी पता नहीं कब सुधीश के मन में एक ख्वाहिश ने जन्म ले लिया। वह पापा की सीमित क्षमता जानता था इसलिए उसे मन के एक कोने में दबा कर रखे रहा 'फिर कभी ' के लिए।
Amit Saini
बिल्कुल सही लिखा।।।पति परिवार की खुशी में , अपने लिए जीना भूल जाता है
RAJESH KUMAR SAINI
bahut bahut achchha likha aapne. fir kabhi kab aata hai ,, koi bhi nhi janta. mai bhi nhi janta isliye aaj abhi kuch kaam kar lene chahiye.
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Shashi Shrivastava
बढ़िया. बधाई.
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Anita
truth of our life😊😊
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Mamta Upadhyay
bahut khubsurat
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Monika Kaushik
superb ♥ touching
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Krishna Raj
Dil ko chu lene Wali kahani. Phr kbhi ek aisa such jise shayed hm sbhi ne mn me chuakr rkha h
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Dr. Santosh Chahar
लाजवाब रचना। बहुत खूबसूरती से मध्यमवर्गीय आय वाले लोगों की हकीकत को लिखा है जिनके कुछ सपने " फिर कभी" के पिंजरे में कैद रहते हैं।🙏🙏
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