प्रेम पत्र

विजय कुमार सपत्ती

प्रेम पत्र
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Akanksha Dikshit
अपना सा लगा ये प्रेमपत्र।बहुत अच्छा
उम्मेदसिंह बैद
ये मेरा प्रेम पत्र पढकर के तुम नाराज ना होना। बङा ही बोर लगता है, तेरा लम्बा ये अफ़साना…।  यार विजय, एक बात तो माननी पङेगी, कि आपने सारे पत्र-लेखकों की कमी अकेले पूरी कर दी। यार शर्त 1500 से ज्यादा शब्दों की थी आप तो 150000000000000000000000000000… …  000000000000000… शब्दों से भी आगे निकल गए मित्र! प्रेम शब्द भी कोई 170000000 …000000 बार आया है, पर प्रेम तो कहीं छू भी नहीं पाया यारा! अब दोबारा पढने की सजा न देना मित्र! आज की यह कथा आप पर ही शेष करता है साधक, क्योंकि आपके बाद ही मैं हूँ यारा… अब मुझे पढने का धैर्य जिसमें बचा होगा, उस महापुरुष से मिलना पङेगा मित्र! जय हो विजय की… जय हो मित्र! 
Vishwajeet Singh
सर आज तक मैनें हिन्दी में ऐसा प्रेम पत्र नहीं देखा है ये एक अकल्पनीय गाथा है कोटि कोटि धन्यवाद आपको
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