प्रारब्ध

अपराजिता अनामिका श्रीवास्तव

प्रारब्ध
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सारांश

" मुझसे नव्या का मिलना एक इत्तेफाक मात्र न था बल्कि ये सब विधाता का लिखा है ...उस नेक आत्मा का कर्ज था मुझ पर और मै उसे इन साधनाओं से बचा कर वही अदा किया हूँ । उसके अंदर की भैरवी अब कभी प्रकट नही होगी क्योंकि अब ग्रहों और समय की वैसी जुगलबंदी लगभग अस्सी साल बाद होगी और तब तक उसे उसका प्रारब्ध मिल चुका होगा । लेकिन , तुम्हारी सजा अब शुरू होती है ...सभी सिद्धियां तुम्हे छोड़ रही हैं ...तुम फिर से वहीं आ गये हो जहां से दिक्षा शुरु हुई थी ...और अपने इस प्रारब्ध के जिम्मेदार तुम हो ।"
tuktuk
अदभुद।
Santosh Nayak
बहुत ही रोचक कहानी। पुराने/नये का तालमेल। गागर में सागर भरना इसे ही कहा जाता है।
प्रिया ठाकुर
इतनी सजीव कल्पना। या फिर ये सत्य है जो भी है बहुत ही सुन्दर है। अविस्मरणीय रचना
Syed Abid
एक बहस छिड़ सकती है कि ये लेखक की कल्पना है या कोई सच्ची घटना जिसे उसने जैसे तैसे पेश भर कर दिया है ! इतनी सजीव कल्पना शक्ति अनायास ही नही होती ! ये अद्भुत है और संग्रह योग्य है !
Pranjli
bohot hi sunder lekhn...,👏👏👏
Meena Bhatt.
एक अलग ही कल्पना है आपकी कलम कि पकड़ ऐसी कि मां सरस्वती विराजमान हो गई।शुभकामनाएं
Manisha
अति उत्तम
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