प्रारब्ध

अपराजिता अनामिका श्रीवास्तव

प्रारब्ध
(282)
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सारांश

" मुझसे नव्या का मिलना एक इत्तेफाक मात्र न था बल्कि ये सब विधाता का लिखा है ...उस नेक आत्मा का कर्ज था मुझ पर और मै उसे इन साधनाओं से बचा कर वही अदा किया हूँ । उसके अंदर की भैरवी अब कभी प्रकट नही होगी क्योंकि अब ग्रहों और समय की वैसी जुगलबंदी लगभग अस्सी साल बाद होगी और तब तक उसे उसका प्रारब्ध मिल चुका होगा । लेकिन , तुम्हारी सजा अब शुरू होती है ...सभी सिद्धियां तुम्हे छोड़ रही हैं ...तुम फिर से वहीं आ गये हो जहां से दिक्षा शुरु हुई थी ...और अपने इस प्रारब्ध के जिम्मेदार तुम हो ।"
कविता जयन्त श्रीवास्तव
पढ़कर मैं अभिभूत हो उठी ...और आज से आपकी फैन भी
bablendra sharma
बहुत ही रोचक और पराविज्ञान पर एक शानदार रचना।
Kuldeep
wow very interesting...
Poonam Grover
bhut bdiya😊🌹🌹
Asha Jha
bahut sunder adbhut rachna
मधुर कुलश्रेष्ठ
नैतिकता पूर्ण लाजवाब कहानी
ravinder agarwal
kya aisa hota hai, pta nai. lekin kahani ne bahut romanchit kiya
tuktuk
अदभुद।
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