प्रायश्चित

Ashu Rathore

प्रायश्चित
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सारांश

मैं जा रहा हूँ अब नही आऊंगा जब तक आप इसे छोड नही देते
प्रभु दयाल मंढइया
मित्रवर श्री आशु राठौङ जी,बधाई हो आपने कहानी लिखने का प्रयास किया।कहानी में व्यक्त आपका दुख और आक्रोश बिल्कुल सही है,मगर अभिव्यक्ति सही नहीं हो पाई।प्रयास करते रहें गिर-गिर की ही सवार होते हैं।मेरा विचार है लिखने के साथ-साथ पढना बहुत जरूरी है।बहुत अच्छ्-अच्छे लेखक हैं हमारे आस पास पहले उन्हें पढकर समझने का प्रयास कीजिए।
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बृजभूषण खरे
बहुत अच्छी अभिव्यक्ति. बेहतरी लेखन.
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