प्रत्यर्पण

सुमन सिन्हा

प्रत्यर्पण
(14)
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सारांश

हाँ ! कल छुआ था तुमने, छू लिया था ए चाँद, सागर की उन्मत लहरों को बिखेर दी थी धवल चांदनी अपनी, उस जल राशि पर, वो तिरता संगीत, तैरने लगा था फिर से उस सिन्धु में, वो तिरता संगीत, तैरने लगा था फिर से उस ...
Arun Tiwari
बहुत सुन्दर
Ravindra Narayan Pahalwan
बहुत ही अच्छी रचना...
Rekha Sharma
सुन्दर कविता 
Satyendra Kumar Upadhyay
अत्यंत सारयुक्त व प्रासंगिक कविता ।
Sanjeeva Kumar
Bahot hi achhi kavita, aapka shabd chayan evam vinnyaas bahot hi umda hai aur kavita ka vaw eik nirjhar ki tarah sadaiv prawaahit rahta hai. Eik achhi rachna ke liye dher sara dhnyawaad.  
Smita Shilpi
सुन्दर रचना 
ज्योति खरे
मन के भीतर की बैचनी को छुपा पान उचित नहीं है, संघर्ष को जीतने के लिए इसे उजागर करना पड़ता है, एक रचनाकार की बैचेनी को उजागर करती जीवट रचना  बहुत सुंदर  बधाई 
Rahul Kumar
The poetess has expressed her true feelings from the core of her heart .
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