पीजीआई वार्ड नं १८

अंकुर त्रिपाठी

पीजीआई वार्ड नं १८
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सारांश

कॉलेज पहुचते ही.....परी को देखा ... वो खिलखिला रही थी ... मुस्कुरा रही थी ..... वो बेहद खुश थी | और मैं .....घुट - घुट कर जी रहा था !! उस दिन परीक्षा के ३ घंटे मुझे अपने जीवन के सबसे कठोर घंटे प्रतीत हो रहे थे ..... पेपर देते देते ही मुझे अपनी तबियत बिगड़ने का आभास होने लगा था ... सर दर्द से फटा जा रहा था .... अजब सी घुटन महसूस हो रही थी ... परीक्षा समाप्त होते ही ...सोचा परी से बात करुगा ...पूछूगाँ आखिर ये सब क्यों ??? परी को रोक पाता ... वो किसी गैर का हाथ थामे कॉलेज कैंटीन के दरवाजे को पर करी जा रही थी ... मुझे हिम्मत नहीं हुयी कि उसको रोकूँ और कह दूँ ...तुम मेरी #परी नहीं हो सकती ....वो परी जिसे मैंने डूबकर चाहा है .....!!
Gaurav Sisodia
ye Kya kahani Hai ...itni choti or pari ne use chooda kyu...
नीता राठौर
आपकी दोनों कहानियां पढ़ीं।अच्छा लिखा है मगर परी क्यू गई,ये स्पष्ट नही हुआ।जानना चाहिये था।
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anurag
बहुत खूब
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