पिता के कंधे से टिककर / अर्पण कुमार

अर्पण कुमार

पिता के कंधे से टिककर / अर्पण कुमार
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सारांश

पिता के कंधे से टिककर अर्पण कुमार एक पिता के कंधे से लगकर मुझे मेरा बचपन याद आया तब ये कंधे इस तरह कमजोर नहीं थे बेतहाशा भीड़ में इन्हीं कंधों पर चढ़कर मैं रावण दहन देखा करती थी उम्र के साथ मेरे जीवन ...
talent fresh
बहुत ही भावना और कुशल काव्य
इला सिंह
वाह ,सुन्दर
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