पास तक फ़ासले

कमलानाथ

पास तक फ़ासले
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सारांश

पास तक फ़ासले यह कहानी है एक शादीशुदा नव-यौवना की जो अपने जीवन में अचानक आई परिस्थितियों से सहसा पशोपेश में पड़ जाती है. एक है बाँका जवान, जो लौटते वक़्त हर शाम गाँव से गुज़रता है और थोड़ी देर बैठ कर अलगोज़ा पर मधुर धुनें बजाते हुए सुस्ताता है. वे एक दूसरे को पसंद करते हैं, पर सामाजिक व्यवस्था उनकी नज़दीकियों को फ़िलवक़्त स्वीकार करने के लिए आगे बढ़ी नहीं है. क्या वह अपने भविष्य के बारे में खुद निर्णय ले पाएगी या समाज का बंधन उसे बार बार सोचने पर मजबूर करता रहेगा?
अनिल कुमार
बहुत-बहुत अच्छी रचना । सहज, सुन्दर, सारगर्भित ।
Anjali Meena
वाह बहुत ही अच्छी कहानी 👌👌
Khushboo
बेमिसाल. बिल्कूल शीर्षक़ की तरह ही हैं|
Sunil Shukla
कथानक एवं.भाषा के स्तर पर उच्चकोटि की कहानी, लेखक को धन्यवाद ।
Kaushal Madan
बहुत अच्छी रचना यथार्थवादी
KHAN akela
Salute,,i am crying now after read this story No words.only and only ,,salute
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