परायेपन का दंश- बस अब और घुटन नहीं

क़ायनात ख़ान

परायेपन का दंश- बस अब और घुटन नहीं
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सारांश

जाने अनजाने पर आज भी कई संभ्रांत और सुशिक्षित परिवारों में भी बरसों बीत जाने के बाद एक बहु पराई ही मानी जाती है। ऐसी ही कहानी ऋचा की है जिसने खुद को इस परायेपन के दंश से मुक्त कर लिया!
yash panikar
bohat acchi shiksha hai iss story mai, i love it
rashmi sinha
hmare smaj ka jitajagta sach
Aparna Garg
सत्य है, जब आपका साथी आपके प्रति मौन हो जाता है तो आप उसे खो चुके हैं, इसीलिए वक़्त रहते संभालना बहुत जरूरी बन जाता हैं।
Kavita Chaudhary
bahut sahi likha aapne mam but har bahu bhi itni achchhi nhi hoti
Dr Pratibha Saxena
बिल्कुल सही लिखा आपने.काश इस कहानी से लोग कुछ सीखें.अत्युत्तम ,समाजोपयोगी , यथार्थ कथानक.
Gyan Pandey
बिलकुल सच है ऐसा ही अक्सर होता संयुक्त परिवार टूटने का ये भी एक मुख्य कारण है भू का क्या कोई अस्तित्व नही होता कही पर अविश्वास किया जाता है कहि पर प्यार नही मिलता ये समाज कब सुधरेगा
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