परछाइयों के उज़ाले

कविता वर्मा

परछाइयों के उज़ाले
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सारांश

कोई कमी नहीं थी सुमित्रा की जिंदगी में लेकिन कुछ तो था जो खाली था अधूरा था .समाज की वर्जनाएं थीं खुद की तय हदें थीं जिम्मेदारियां थीं जिन्होंने उसे सोचने को रुकने को मजबूर किया .बहुत कुछ तो नहीं चाहा था उसने लेकिन जो चाहा था वह समाज को मंजूर ना था . उम्र के उस दौर में भी स्त्री के लिए कितनी वर्जनाएं आखिर क्यों ?
Rajani Barnwal
हां ये सच है, हम अपने पति को सर्वस्व, मानते हैं, लेकिन कभी ऐसा लगता है जैसे वो मुझे नहीं समझते हैं, कहने को बहुत कुछ पर जिन्दगी मे कुछ खालीपन लगता है शायद कोई दोस्त, जो एक गृहिणी के पास नहीं होता है, एक दोस्त होना चाहिए, बहुत अच्छी रचना.......।
Sunita Sukhralia
Wah..
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Vanita Handa
दिल को छू गई।
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Rukmani Thapliyal
लाजबाब कहानी
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MUKESH GUPTA
बहुत ही मार्मिक कहानी थी बहुत ही सरल भाषा में व्यक्त किया है आपने
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Promila Thakur
बड़ी समझदारी का काम किया उस बच्ची ने
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Aarti Thukraal
👌👌👌👌👌👌👌👌👌
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अंक मौर्या
बहुत खूब । आपके शब्दों ने अंदर तक झकझोर कर रख दिया । शब्दों का अपने बहुत ही अच्छे से चयन किया है और कहानी तो लाजवाब है । 👌💐😊
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mohdaqeel khan
bahot hi achi kahani aapne likhi hai
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