परछाइयों के उज़ाले

कविता वर्मा

परछाइयों के उज़ाले
(185)
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सारांश

कोई कमी नहीं थी सुमित्रा की जिंदगी में लेकिन कुछ तो था जो खाली था अधूरा था .समाज की वर्जनाएं थीं खुद की तय हदें थीं जिम्मेदारियां थीं जिन्होंने उसे सोचने को रुकने को मजबूर किया .बहुत कुछ तो नहीं चाहा था उसने लेकिन जो चाहा था वह समाज को मंजूर ना था . उम्र के उस दौर में भी स्त्री के लिए कितनी वर्जनाएं आखिर क्यों ?
Madhuri Gambhir
बहुत अच्छी रचना। यह सच है कि ज्यादातर लोग समझौते का जीवन ही जीते हैं।
Tarun devsingh
very nice story
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Heera L kanaujiya
very good writing
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Sidharth Singh
nice
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ajay
दो विपरीतलिंगी समवयस्कों के स्वस्थ संबंधों पर समाज की संकुचित सोच का प्रभाव दर्शाने वाली कहानी अच्छी है पर अब समय आ गया है कि इस सोच का मुखर विरोध हो।बस मेरे दृष्टिकोण से यही कमी रही।
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Anshu Agarwal
bahut achchi
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अंशु
Bahut khubsurat....shabdo se pare ..
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अरुण झा
पूर्व पठित ,आपकी पुस्तक से
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Meenakshi Bhandari
behad achhi Kahani. Padte padte mai khud kahi kho gayi.
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Darvinder Singh
Very Nice
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