परछाइयों के उज़ाले

कविता वर्मा

परछाइयों के उज़ाले
(200)
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सारांश

कोई कमी नहीं थी सुमित्रा की जिंदगी में लेकिन कुछ तो था जो खाली था अधूरा था .समाज की वर्जनाएं थीं खुद की तय हदें थीं जिम्मेदारियां थीं जिन्होंने उसे सोचने को रुकने को मजबूर किया .बहुत कुछ तो नहीं चाहा था उसने लेकिन जो चाहा था वह समाज को मंजूर ना था . उम्र के उस दौर में भी स्त्री के लिए कितनी वर्जनाएं आखिर क्यों ?
Aarti Thukraal
👌👌👌👌👌👌👌👌👌
अंक मौर्या
बहुत खूब । आपके शब्दों ने अंदर तक झकझोर कर रख दिया । शब्दों का अपने बहुत ही अच्छे से चयन किया है और कहानी तो लाजवाब है । 👌💐😊
mohdaqeel khan
bahot hi achi kahani aapne likhi hai
Shashi Sharma
nishchal prem se sarabor Kahani dhanywad
Pragya Shrivastava
too good
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Archana Varshney
बहुत सुंदर
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Dheeraj Rajput
awesome heart touching story
Madhuri Gambhir
बहुत अच्छी रचना। यह सच है कि ज्यादातर लोग समझौते का जीवन ही जीते हैं।
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Tarun devsingh
very nice story
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