न हुई गर मेरे मरने से तसल्ली न सही

मिर्ज़ा ग़ालिब

न हुई गर मेरे मरने से तसल्ली न सही
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सारांश

न हुई गर मेरे मरने से तसल्ली न सही इम्तिहाँ और भी बाक़ी हो तो ये भी न सही ख़ार-ख़ार-ए-अलम-ए-हसरत-ए-दीदार तो है शौक़ गुलचीन-ए-गुलिस्तान-ए-तसल्ली न सही मय परस्ताँ ख़ूम-ए-मय मूंह से लगाये ही बने एक दिन ...
योगरत्न सन्तराम
हमने गालिब ! आप को शायरों की सरहत में गुजरते देखा। शेरों ,शायरी , ग़ज़लों ,मुहावरों में हरदम महकते देखा।।
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दीपिका पाण्डेय
सितम ढाए ग़र ज़माने ने रूह समेटे हुए बा खु़दा। "क्षिर्ज़ा "ए मोहब्बत भी है कुछ कम नहीं।। 🙂 उत्तम।।
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