न जाने क्यों...?

डॉ.मीनाक्षी स्वामी

न जाने क्यों...?
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सारांश

सुबह जैसे ही घड़ी का अलार्म बजा, वह भुनभुनाया। मीठी नींद में खलल डालने वाले अलार्म को उठाकर फेंक देने की इच्छा हुई, मगर जैसे-तैसे उसने खुद को जब्त किया। चिढ़ते हुए उसके हाथ अलार्म घड़ी तक पहुंचे और ...
Sudhir Kumar
संजोग से ये मेरी कहानी लगी, मैं भी बैंक में हूँ, सारी लिखी बातें सत्य के करीब है। कहानीकार को जिंदगी के इतने करीब लाने के लिए साधुवाद
Hemalata Godbole
ऐसा भी होता है । पहले बधाई ।मन मे चांदनी हो तो जेठ की धूप बेअसर हो जाती है।सुंदर ,मनोवैज्ञानिक कहानी।आप मेरी चीजें देखना, समीक्षा देना नभूलें। शुभकामनाएं।
Vikashree Kemwal
bahut pyaari khaani ...
vineeta aeron
yes jindagi ko ek refreshment ki jarurat hoti hi
Mamta Upadhyay
बहुत अच्छी कहानी 👌
तनेराव सिंह डिग्गा
बहुत ही अद्भुत और प्ररेणादायक कहानी...मजा आ गया
Vandana Rastogi
एक हल्की -फुल्की मनोरंजक कहानी ।अच्छी है। बधाई ।
Archana Varshney
बहुत सुंदर
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