न जाने क्यों...?

डॉ.मीनाक्षी स्वामी

न जाने क्यों...?
(87)
पाठक संख्या − 11114
पढ़िए

सारांश

सुबह जैसे ही घड़ी का अलार्म बजा, वह भुनभुनाया। मीठी नींद में खलल डालने वाले अलार्म को उठाकर फेंक देने की इच्छा हुई, मगर जैसे-तैसे उसने खुद को जब्त किया। चिढ़ते हुए उसके हाथ अलार्म घड़ी तक पहुंचे और ...
Pawan Kumar
बहुत ही सुन्दर एवं सजीव मानसिक चित्रण ।
नीता राठौर
😊😊 अच्छी रचना मीनाक्षी जी।
Sudhir Kumar
संजोग से ये मेरी कहानी लगी, मैं भी बैंक में हूँ, सारी लिखी बातें सत्य के करीब है। कहानीकार को जिंदगी के इतने करीब लाने के लिए साधुवाद
Hemalata Godbole
ऐसा भी होता है । पहले बधाई ।मन मे चांदनी हो तो जेठ की धूप बेअसर हो जाती है।सुंदर ,मनोवैज्ञानिक कहानी।आप मेरी चीजें देखना, समीक्षा देना नभूलें। शुभकामनाएं।
Vikashree Kemwal
bahut pyaari khaani ...
vineeta aeron
yes jindagi ko ek refreshment ki jarurat hoti hi
Mamta Upadhyay
बहुत अच्छी कहानी 👌
सारी टिप्पणियाँ देखें
hindi@pratilipi.com
080 41710149
सोशल मीडिया पर हमें फॉलो करें।
     

हमारे बारे में
हमारे साथ काम करें
गोपनीयता नीति
सेवा की शर्तें
© 2017 Nasadiya Tech. Pvt. Ltd.