नीलांजना?---(अन्तिम भाग)

सरोज वर्मा

नीलांजना?---(अन्तिम भाग)
(55)
पाठक संख्या − 579
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सारांश

सुखमती का ऐसा रूप देखकर, नीला का हृदय घृणा से भर गया, उसे लगा कि वो ऐसी मां की पुत्री है जो अपने स्वार्थ के लिए किसी की भी बलि दे सकती है, उसे बहुत बड़ा आघात लगा,उसकी आंखों के सामने अंधेरा छा गया, ...
Karuna Tyagi
bahut sundar kahani
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Nisha Sori
ant bahut hi dukhd tha socha nhi tha is bare me , story bahut hi achhi hai .
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Nisha Aiya
अंत बहुत दुखी रहा फिर भी ठीक है , कहानी है तो बढ़िया 👌👌
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prabhjot
👍
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Namita prasad
आज ही सभी भाग पढीं हू।कहनी का अँतिम भाग रूला गया,
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Santosh Nayak
कहानी अच्छी लगी। कैलाश और सूर्य दर्शन शील का चरित्र पसंद आया।
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Vinaya Rajora
bahut hi achi kahani.
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Deepak Chaudhry
बहुत अच्छी तरह से शब्दों को पिरोया गया, कहानी भी चरणबद्ध नई-नई धाराओं के साथ चलती रही , उद्देश्य गहनता लिए थी। साथ ही अध्यात्मिकता का प्रसाद पाठकों को मिला। सार्थक सृजन।
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Yakoob Khan
एक बहुत अच्छी कहानी का दुखद अंत अखर रहा है। मुझे सुखद अंत वाली कहानियाँ ज़्यादा अच्छी लगती हैं। ख़ैर हम जैसा सोचते हैं वैसा होता कहाँ हैं। अगर ऐसा होता तो दुनियाँ में कोई दुखी नहीं होता। बहरहाल आपने बहुत अच्छी कहानी गढ़ी है।
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R.K shrivastava
यह बहुत मर्मस्पर्शी प्रेम कहानी है । जिसका अंत बलिदान से होता है, तथा एक नई शुरुआत का सूत्र 'संघ शरणम् गच्छामि' इस वाक्य में छुपा हुआ है ।।.
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