निर्भया नहीं मिली…

विवेक मिश्र

निर्भया नहीं मिली…
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सारांश

लाल होते आसमान में दिन और रात दम साधे हुए खड़े थे और उनके बीच साँझ धीरे-धीरे वेदना जन रही थी। उसके खो जाने से बच्चों की सी रुलाई गले तक भरी आती थी… वह अक्सर ऐसे खेल खेला करती थी। कभी छुप जाती। कभी ...
Dr. Santosh Chahar
सशक्त, सार्थक व मार्मिक कथानक। नमन है आपकी लेखनी को जो अनगिनत निर्भयाओं के दर्द को उकेर कर समाज को जागरूक करने का कार्य कर रहे हैं।
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ब्रजेंद्रनाथ मिश्रा
बहुत अच्छी भावात्मक अभिव्यक्ति! साधुवाद! इसी साइट पर मेरी रचनाएँ भी पढ़ें और अपने विचार दें। ब्रजेंद्रनाथ
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श्वेता रंजन
very nice sir
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अनुश्री त्रिपाठी मिश्रा
निशब्द हूं पढ़कर , तार तार हो कर रह जाती स्मृतियों को ढूंढने का क्रम वाकई अद्भुत रहा , one of the best writings I have ever read 👏👏👏👏👏👏👏👏👏👏👏👏👏👏👏👏👏👏👏
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Laiba Hasan
speechless
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Tara Ji
ati sundar post
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Shivani Tiwari
किसी स्त्री के साथ बदसलूकी होने के बाद हम सड़को पर कैंडल मार्च तो कर सकते है.... लेकिन जब तक हमारे घर कि स्त्री पर विपदा ना आये हमारे हाथ मदद के लिये आगे नहीं बढ़ सकते.... ये कैसा डर हैं.? क्यों हम अपनों के लिये जान भी देने को तैयार हो जाते है किंतु गैर बेटियों के लिये आवाज भी नहीं उठा सकते... हमारे आज के समाज की यही मानसिकता है... कड़वा किन्तु यही सत्य है...
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Shalini Pandey
very heart touching story and very nice
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अमित शर्मा
निशब्द कर दिया आपके इस लेख ने।
Rekha Jangra
रोगंटे खडे कर देने वाली कहानी, अद्भुत शैली हानी
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