निर्भया नहीं मिली…

विवेक मिश्र

निर्भया नहीं मिली…
(89)
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सारांश

लाल होते आसमान में दिन और रात दम साधे हुए खड़े थे और उनके बीच साँझ धीरे-धीरे वेदना जन रही थी। उसके खो जाने से बच्चों की सी रुलाई गले तक भरी आती थी… वह अक्सर ऐसे खेल खेला करती थी। कभी छुप जाती। कभी ...
अमित शर्मा
निशब्द कर दिया आपके इस लेख ने।
Rekha Jangra
रोगंटे खडे कर देने वाली कहानी, अद्भुत शैली हानी
minakshi
osm 👌👌
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Rasika Kulkarni
Very nice story really speechless
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Chanda Pandey
very emotional
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Shauvindra Singh
good wrote
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बरकत 'सहरा'
Speechless........
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Meena Bhatt.
दिल, दिमाक, शरीर की सभी इन्द्रीयों अनिभूति प्रदान करने वाली रचना मैं लेखक नहीं हूं ना इसलिए लिख नही पा रही।आप मेरे भावों को समक्ष सकते हैं शायद।बहुत ही उम्दा लेखन ढेर सारी शुभकामनाएं
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और्व विशाल
शब्द नहीं हैं ,क्या कहूँ ,सूरज को दिया दिखाना समझदारी तो नहीं कही जा सकती है ना । सादर नमन बेहतरीन भावों की अप्रतिम अभिव्यक्ति के लिए । उम्मीद पर दुनिया कायम है,उम्मीद छोड़ नहीं सकते ,हाँ उम्मीद की फिर कहीं कोई निर्भया ना खोये 😔
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