नाम में क्या रखा है

वंदना गुप्ता

नाम में क्या रखा है
(115)
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सारांश

“फलसफों को जरूरत नहीं किसी अफसाने की ये बात तो है बस दिल को जलाने की” .......कुछ ऐसा ही मेरा हाल है . ‘मैं कुछ नहीं से कुछ होने तक’ के सफ़र की अकेली कड़ी हूँ जो अपने अन्दर की कचोट से लडती है झगडती है ...
SANTOSH
bahut hi shandar kahaani h apki. vese itni lambi kahaani padta nhi hu Lekin apki thi isliye padi.
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Divyakshi Panwar
very touchy yrrr ek aurat ke liye uski asmita hi sab kuch hoti h lekin ye aadmi nhi samaj sakte h
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Manju Pant
एक चदसीन कहनी ।
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Samta Parmeshwar
एक स्त्री की भावना को कोई भी पुरुष नहीं समझता ।साम -दाम,दंड -भेद से अपनी बात मनवा कर ही रहता है।किन किन मानसिक उतार- चढ़ाव को झेलते हुए अपनी अस्मिता को बचाए रखने की कोशिश करती हुई निशि। उत्कृष्ट रचना। शत-प्रतिशत सही है।
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indu sharma
मन की उलझनों में उलझी कहानी अच्छी हैं
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Rajani Barnwal
स्त्री की सरलता मे भी एक चतुर पुरुष का आरोप लगाना, अनायास ही लोग स्त्री पर आरोप लगाते हैं
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Savita Ojha
यथार्थ को दर्शाती कहानी
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Radha Kbv
सच है पुरुष सिर्फ पुरुष ही रहता है और अपने भीतर की सारी कालिख नारी पर उंडेलता रहता है .इससे उसका पौरूष वाला अहं पुष्ट और संतुष्ट होता रहता है.
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ajeetsingh
अच्छी कहानी है
हुमा सिद्दीक़ी
निःशब्द हूँ मैं इसे पढ़ने के बाद 👌👌👌👌👌👌👌👌👌
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