नापाक

Hema Ingle

नापाक
(13)
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सारांश

नापाक मेरा जिस्म नहीं, तेरी सोच है ...
रोहिला रमेश
पूर्णता,स्त्री या पुरूष दोनो मे से किसी को नही मिलती।दोनो एक दूसरे में अप्रत्यक्ष रूप में मौजूद होते है।दोनो की प्रकृति का प्राकृतिक संतुलन ही जीवन है।संभ्यता या संस्कृति भी जोड़ती है तोड़ती नही।दोनो में ही कितनी विशुद्ध सभ्यता या संस्कृति है यह भी दोनो की सोच पर निर्भर है।पर कही सभ्यता या संस्कृति ही तोड़ने का काम करे वो विशुद्ध संस्कृति,सभ्यता नही।विशुद्ध तो दोनो तृप्त,आनंदित रहे वही होती है।
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Kavi Rohit Kumar
बहुत सुंदर। पौरुष पर प्रहार
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डॉ. प्रदीप कुमार शर्मा
बढिया है। कुछ वर्तनीगत त्रुटियाँ रह गई हैं
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Ajay Nidaan
बहुत गहरी और उम्दा सोच को ज़ाहिर करती रचना हैं आपकी कम शब्दों में ज़्यादा कहना और अर्थपूर्ण । समाज को सन्देश देती हैं ।
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Jiwan Sameer
सुंदर प्रस्तुति
आकाश इफेक्ट
कुछ बेहतर लिखना चाहती थी पर शायद खुद ही नही समझ पायीं कि क्या कहना चाहती हैं आप। तारतम्य की कमी लगती है। विषय-वस्तु सही है पर शब्दों के माध्यम से उसे उकेरने में कहीं न कहीं कुछ कमी सी लग रही है।
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शैलेश -इंदौर न 1
विडंबना हैं पाक नापाक जैसे शब्द औरतो के लिए ही प्रयुक्त किये जाते है पुरुषो के लिए नहीं। इस सोच को पोषित और पल्लवित करने मै पुरुषो के साथ महिलाये भी बराबर की भागीदार हैं, ऐसा मेरा सोचना है 🙏
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