दो बाँहें, एक गंध और ख़ालिस रोमांस

रजनी मोरवाल

दो बाँहें, एक गंध और ख़ालिस रोमांस
(230)
पाठक संख्या − 25949
पढ़िए

सारांश

शुरुआती कुछ सीढ़ियाँ ईला धड़ाधड़ चढ़ गई थी, अपने सीने के उतार-चढ़ाव को बेकाबू होता देख वह स्वयं पर मुग्ध थी इतना उभरा हुआ शेप तो सामान्यतः दिखता नहीं उसका फिर आज कैसे ? उसे खुद ही अपनी इस बदमाशी पर हंसी आ ...
Dr Monica
वाहह
रिप्लाय
Dev Tiwari
बहूत सून्दर रचना👌👌👌
रिप्लाय
विनीत शर्मा
आदरणीया, अज्ञानी हूँ कृपया क्षमा कीजियेगा। आपकी उम्दा रचना के लिए आपको बधाई। आपकी प्रोफाइल देख कर लगा था आज एक अच्छी रचना पढ़ने को मिलेगी, परंतु कहानी जीवंत नही हो पाई। किसी किसी जगह कहानी उत्सुकता बंधाती तो कहीं मृत हो जाती। आप हिंदी के रचनाकार व सम्मानप्राप्त लेखिका हैं '।' '|' फर्क है, कुछ जगह कोमा लगाना शायद आप भूल गए हैं। देवी जी एक बार फिर दोहराता हूँ ...... अज्ञानी हूँ, गलती को बताने वाला हमेशा दुश्मन नही होता ..... हितेषी भी हो सकता है। कृपया एक बार पुनः रचना को पढ़कर मेरी कही बातो पर गौर कीजियेगा।
रिप्लाय
arun singh
mind boggling story. and beautiful script.
रिप्लाय
Tanvir Ahmed
ending samaj nai aayi part 2 b laye
रिप्लाय
Geeta Rajput
nice story....
रिप्लाय
Vandana Prasad
behad Shaandar aur khoobsurat Rachna.....ma'am
Ritika Singh
बेहतरीन
सारी टिप्पणियाँ देखें
hindi@pratilipi.com
080 41710149
सोशल मीडिया पर हमें फॉलो करें।
     

हमारे बारे में
हमारे साथ काम करें
गोपनीयता नीति
सेवा की शर्तें
© 2017 Nasadiya Tech. Pvt. Ltd.