दोनो की सांझ #ओवुमनिया - अंतिम पड़ाव

नेहा भारद्वाज

दोनो की सांझ #ओवुमनिया - अंतिम पड़ाव
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सारांश

दोनो की ही सांझ ढल रही आज की भी और माँ की भी... बोर हो गयी रोज की इसी किच किच से , इन्ही के लिये जीवन का सबसे अनमोल समय गवां दिया साथ ही गवां दिया हमसफ़र का साथ भी ! बेवजह ही बीनने बैठी है गेंहूँ के ...
Kusum Kothari
अनुपम, अप्रतिम भाव रचना।
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Vijay Singh
हृदय स्पर्शी कविता । बात जब माँ की हो कौन विचलित नहीं होता है ।
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Antima Singh
वाह सुंदर
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Pooja Arora
bahut khub👌👌
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deepali tiwari
bahut sunder abhivyakti
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Neha Khare
very nice dear ma'am 🙇💐
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रविन्द्र
बहुत सुंदर।।
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