दूसरी औरत

नन्द भारद्वाज

दूसरी औरत
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सारांश

सब कुछ अचानक ही हो गया था जैसे। सगाई और ब्याह के बीच का फासला इतना कम रहा कि उसे और कुछ सोचने-बूझने का अवसर ही नहीं मिला। कपड़े की गुड़िया के समान उसे यहां से वहां ऐसे कर दिया गया जैसे उसका अपना कोई ...
Parinita jaiswal
मैं खुद को किसी भी प्रकार की टिप्पणी करने के योग्य नहीं पाती.......
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नंदिनी सिंह
सुंदर लेखन के लिए साधुवाद
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Anupam Shukla
बहुत ही सुंदर एवं हृदय स्पर्शी कहानी है।
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Sudhir Kumar Sharma
हालात की कोख से उपजा कडवा सच
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prashant bhatt
शानदार...
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Sushma Rathor
heart touching.....
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Baljeet Kaur
कहानी ओर आगे होनी चाहिए थी
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shobha Bhardwaj
औरत कभी पहली या दूसरी नहीं होती वह केवल औरत ही होती है या फिर मां होती है
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