दुर्गा

डॉ. इला अग्रवाल

दुर्गा
(22)
पाठक संख्या − 1665
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सारांश

चल पड़ी थी दूर कहीं दुर्गा,बिना कुछ सोचे क्योंकि अब सोचने को कुछ बचा ही नहीं था। आंखों में आंसू भरे बस सोच रही थी कि उसका कुसूर क्या था आखिर।जन्म के समय उसकी माँ को जो खुशी होनी चाहिए थी,नहीं ...
Hari Agarwal
nice
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Sanjai
colour doesn't matter.... it's our society mentality ....
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रीना शंखवार
सच्चाई तो यही है इला जी। काला रंग स्त्री के लिए अभिशाप ही है।
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मनोज बंसल
बहुत सुन्दर प्रस्तुति
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Sushil Vishnoi
Very nice
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Gaurav Kumar 'वशिष्ठ'
हमारे तरफ एक कहावत प्रचलित है "रूप न देखो गुण को देखो"। बेटी अगर माँ का उपहास करती है तो यह बेटी की गलती नहीं माँ की भी है कहीं न कहीं। बेटी की परवरिश में कहीं खोट जरूर है। उत्तम रचना। साधुवाद।
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Kamal Kant Agarwal
अच्छी कोशिश
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sandeep tanwar 😎
good msg
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