दिल में एक चाह सी मुद्दत से दबी लगती है

प्रषान्त मिश्र

दिल में एक चाह सी मुद्दत से दबी लगती है
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सारांश

दिल में एक चाह सी मुद्दत से दबी लगती है। जिंदगी आस में जिसकी ही कटी लगती है।। आरजू चंद थीं मुझको मेरे कुछ अपनों से। मेरी अपनों से भी बेगानगी सी लगती है।। रेशमी रिश्तों के भरम में मैं जिए जाता ...
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