दरवाज़ा खोलो ..

उपासना सियाग

दरवाज़ा खोलो ..
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सारांश

" दरवाज़ा खोलो !!" " ठक ! ठक !! दरवाज़ा खोलो !!! रात के तीन बजे थे। सुजाता ठक -ठक की आवाज़ की और बढ़ी चली जा रही थी। बहुत बड़ी लेकिन सुनसान हवेली थी। चलते -चलते तहखाने के पास जा कर सुजाता के कदम रुक गए। ...
डॉ. इला अग्रवाल
nirdosh nitesh ki aah farsh se arsh tk jati hi hai pr zyada der ni honi chahiye
G S Saini
प्रभु के पिटारे में पाप पुण्य, लाभ हानि, जीवन मरण, यश अपयश, अमीर गरीब, हर साँस, हर पल, हर क्षण का लेखा जोखा है फिर हम क्यों खुद को कर्ता समझ ने लगते हैं और अपना जीवन नरक बना लेते हैं ये समझ,से परे है।। दिल को छू ने वाली रचना है।
Aruna Garg
achchi kahani.man bhar Aaya phool kawarsa ki kya Galti this jo use mar dala .nari man Ka ESA roop pahli bar dekha.bahut dard bhari kahani .
Manu Prabhakar
ओफ्फ....औरत का औरत के प्रति डाह।जबकि बच्चे की तरह पाली थी। कहानी शानदार है।
Krishna Khandelwal singla
बहुत अच्छी कहानी
शालिनी पंकज
स्वार्थ इंसान की सोचने ,समझने की शक्ति छीन लेता है,बेहद उम्दा लिखा ।
सुधा सिंह
अकेलेपन और प्रेम की तड़प ने सुजाता को गलत कदम उठाने पर मजबूर कर दिया. बहुत बढ़िया कहानी.
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