तृष्णा

स्वाति सिंह

तृष्णा
(82)
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सारांश

जरूरी नहीं कि तुम पास रहो, मुमकिन नहीं कि तुम साथ रहो, पर जब चाहूँ ,तुम्हें जी सकूँ, बन कर ऐसी तलब,एक एहसास रहो । जरूरी नहीं कि तुम ना जाओ कहीं, मुमकिन नहीं कि तुम्हें पाऊँ हर कहीं, पर जब भी ...
Dinesh Singh
👌👌👌💐👍
Sumedha Prakash
बेहतरीन रचना
Urmila Yadav
I read तृष्णा it's lovely my hearts voice
Kirti Pal
Khoobsurat shabdo ka samanwyay
Amit Ambashtha
बहुत ही उम्दा रचना।
saharsh kumat
A heart touching poem having a suitable title 
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