तृष्णा

स्वाति सिंह

तृष्णा
(81)
पाठक संख्या − 2110
पढ़िए

सारांश

जरूरी नहीं कि तुम पास रहो, मुमकिन नहीं कि तुम साथ रहो, पर जब चाहूँ ,तुम्हें जी सकूँ, बन कर ऐसी तलब,एक एहसास रहो ।जरूरी नहीं कि तुम ना जाओ कहीं, मुमकिन नहीं कि तुम्हें पाऊँ हर कहीं, पर जब भी चाहूँ,तुम्
Dinesh Singh
👌👌👌💐👍
Sumedha Prakash
बेहतरीन रचना
Urmila Yadav
I read तृष्णा it's lovely my hearts voice
Kirti Pal
Khoobsurat shabdo ka samanwyay
Amit Ambashtha
बहुत ही उम्दा रचना।
saharsh kumat
A heart touching poem having a suitable title 
सारी टिप्पणियाँ देखें
hindi@pratilipi.com
080 41710149
सोशल मीडिया पर हमें फॉलो करें।
     

हमारे बारे में
हमारे साथ काम करें
गोपनीयता नीति
सेवा की शर्तें
© 2017 Nasadiya Tech. Pvt. Ltd.