तुम

kanchan pandey

तुम
(27)
पाठक संख्या − 427
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सारांश

एक ख़्वाब देखा था तुम जिसमें बसते थे थे लाखों शख़्स वहाँ पे, बस तुम ही जँचते थे। वो रात सुहानी थी, मौसम भी दीवाना था, फिर मेरी आँखें बरसीं, कोई किस्सा पुराना था। जब दिल ये घबराया तुम नज़र नहीं आए, डरकर ...
Ravindra Narayan Pahalwan
रचना पसंद आई...
sunil kumar ojha
सुंदर कविता
सुखचैन मेहरा
जी, बहुत ही सुन्दर लेखन आदरणीया आप हमारी रचना 'तुम' एक बार जरूर पढ़कर देखें...
Sunil Shukla
सुन्दर कविता , भाषा कविता के अनुकूल।
rahul
अति सुंदर
shweta mishra
अच्छी है
Pawan Pandey
मांगा साथ कई ने था, पर मन को तुम भाय। कितनी सुन्दर पंक्ति है, बहुत बहुत बधाई और शुभकामनाएं। सितारे इतने ही हैं, जो कम है।
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