तुम मेरी हो

अरुण झा

तुम  मेरी हो
(2)
पाठक संख्या − 29
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सारांश

यूँ लाज का दामन थामे होआँखों में प्रीत छुपाये होखामोशी के अलख जगाये होरोम रोम से किरणें फूटेंतमस दूर हो,ज्योति यूँ छलकेजीवन के नूतन अर्थ उभरतेतुमको देख नयन छलकतेजीने के हैं राग पनपतेसुख दुख के हैं अर्
Alka Mishra
bahut khoob ahsas
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Rachna Singh
खूबसूरत
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