तितली

विवेक मिश्र

तितली
(135)
पाठक संख्या − 12831
पढ़िए

सारांश

जितनी तेज़ी से दो पटरियों पर दौड़ती रेलगाड़ी भाग रही थी, उसमें बैठे लोग भी अपने पीछे कुछ छोड़ते हुए भागे जा रहे थे और उतनी ही तेज़ी से रेलगाड़ी की खिड़की से दिखता बाहर का संसार- घर, दुकान, पेड़, जानवर, खेत, ...
मनु
बहुत खुब ये कहानी दिल की गहराई मे उतरती जाती है महानगरों की सच्चाई को बयान करती और एक तितली मेरे मन को भी झकझोरने लगती वास्तव मे
रिप्लाय
Madhu mishra Dwivedi
bhut hi achhi kahani👌👌👌👌
रिप्लाय
Rubi Khan
bhut khoob..very nice story
रिप्लाय
Atul Raj
nice
रिप्लाय
Poonam Bhatia
दिल थम सा गया
रिप्लाय
Mamta Upadhyay
निशब्द
रिप्लाय
Barkha Verma
aaj ki uva pidhi ki bhot hd tk khi gyi schchayi,Achi lgi
रिप्लाय
Sandhya Singh Verma
बहुत -बहुत -बहुत दिनों के बाद ऐसा लगा जैसे किसी जिन्दा कहानी को पढ़ा नहीं बल्कि छुआ। छुआहर बार आपको पढ़ते हुए मेरी धड़कनें बहुत तेज हो गयी। गयी।बहुत बहुत शुभकामनाएं बधाई और प्रणाम सर 🙏🏻
रिप्लाय
tarannum ara
Its reallity
रिप्लाय
sudha tiwari
समाज का कड़वा सच लिखा आपने ऐसा लगा जैसे पढ़ते समय वो सब कुछ हमारे साथ हो रहा है
रिप्लाय
सारी टिप्पणियाँ देखें
hindi@pratilipi.com
080 41710149
सोशल मीडिया पर हमें फॉलो करें।
     

हमारे बारे में
हमारे साथ काम करें
गोपनीयता नीति
सेवा की शर्तें
© 2017 Nasadiya Tech. Pvt. Ltd.