तर्पण

कुमार गौरव

तर्पण
(106)
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सारांश

वो तो कहिए दशक बाद जानकी बुआ नैहर आई और वो अड़तीस की उम्र में रमेसर को हल्दी लगवा गई । थाली चौकस लगने लगी तो रमेसर कुदाल की बेंत से फूलकर खेत की मेड़ हो गये । लेकिन दुर्भाग्य ने तब भी पीछा न छोड़ा सात आठ सालों तक आंगन में किलकारी न खिली तो दलन के प्रति मोह और बढ़ गया । दलन जब पढ़ने के लिए शहर जाने लगे तो पत्नी का सारा जेवर बटेसर को थमा दिये थे " बढ़िया जगह एडमिशन कराईयेगा भैया । यही एक तो हैं सबके । किसके लिए जोगेंगे धन दौलत । " पत्नी कुनमुनाई थी तो झिड़क दिए थे " मरोगी तो साथ लेकर जाओगी क्या ?तर्पण तो यही करेगा न । "
Vijay Kumar
अच्छी कहानी है
Jyoti Bharti
bhut dukhad par sach se pripurn kahani
Savita Ojha
आज के परिवेश की कटु सच्चाई है
Sandy Honey
बहुत सुंदर। ।।।
Mahesh Sharma
neki or dariya me dar
Sadhana Tiwari
आज के समाज की यही सच्चाई है ये कहानी
Prachi Mehrotra
this is awesome..... finally sudhi and chander are living happily ever after...
Arvind Tyagi
OK . This is the truth of the society. But we should write for unity of society.
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