झूठी पत्तल

Vishnu Jaipuria

झूठी पत्तल
(25)
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सारांश

जूठी पत्तल
Om Prakash Chauhan
सर जी के कहानी तो दिल को छू गयी
mannu
बहुत अच्छी रचना
Renu
अत्यंत मार्मिक कहानी विष्णु जी | मेरे मन को कहानी के अंत में चौधराइन से कुछ मानवता की उमीद थी पर वो जाती रही | व्यर्थ के दिखावे के प्रपंच में सोये कथित इन दानवीरों को दरिद्र लोगों की आहें सुनती कहाँ हैं ? ऐसे रुतबे को धिक्कार है ! गरीबों की मानवीयता देखिये फिर भी दुआ दे जाते हैं |
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सरोज वर्मा
क्या फायदा,ऐसी अमीरी का जो किसी भिखारिन को खाना ना खिला सके,भाड़ में जाए ऐसा रूतबा!!
Hitendra Kumar
होता ही ऐसा है कि पाठक लेखक के विचारों से अलग कहानी का आकलन करता है... ओर इस बात को प्रभावित करने कुछ लेखक प्रयास भी करते हैं...। पर आपकी सरल रचनाये पाठक को मुक्त मनसे कुछ भी सोचने देती हैं!!
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Mala Joshi Sharma
खूबसूरत लिखा है । कम शब्दों में सब कुछ कह दिया । बधाई ।
डॉ.गीता यादवेन्दु
बहुत अच्छा व्यंग्य । बिन मेहनत के प्रजा के शोषण से धन इकट्ठे करने वाले ऐसे ही होते हैं ।
Dharm Pal Singh Rawat
अच्छी रचना। सधुवाद।
Vijay Singh
बहुत ही साधा हुआ कटाक्ष हमारे समाज के धनकुबेरों पर ।
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