झुलसी दुआ

मोहित शर्मा ज़हन

झुलसी दुआ
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सारांश

उसकी दिनभर की थकान नींद से कम बल्कि घरवालों से घंटे-आधा घंटे बातें कर ज़्यादा ख़त्म होती थी। अक्सर उसने कितने लोगो को कैसे बचाया, कैसे बीमारी में भी स्टेशन आने वालो में सबसे पहला वो था, कैसे घायल पीड़ित के परिजन उस से लिपट गए, कैसे ट्रैफिक में कुछ देर हो जाने पर उनपर भीड़ ने पत्थर बरसाए या उनकी पिटाई तक की। "माँ! आज आप मानोगी नहीं। सीढ़ी पर से झूलकर बिल्डिंग से गिरता हुआ बच्चा पकड़ा मैंने, पूरे मोहल्ले ने आशीर्वाद दिया मुझे। कोई कपडे दे रहा था, कोई वैन में घर पर बनाई मिठाई ज़बरदस्ती रख गया। बच्चे की माँ तो अपना सोने का कड़ा उतार कर दे रही थी पर मैंने लिया नहीं। उसे देख कर आपकी याद आ गयी।"
Chandan Singh
यथार्थ परक कहानी
Meena Bhatt.
जन्म-मरण तो सिक्के के दो पहलू हैं।नायक ने ईश्वर से प्राथना कर के उसे उस दर्द से मुक्ति दिला दी।अच्छी रचना।धन्यवाद
Shashi Sud
कोमल मन सब का भला ही सोचता है
Joti Ahuja
bahut sundar kahani
Archana Varshney
मार्मिक अभिव्यक्ति
ईशा अग्रवाल
सुंदर एवं मार्मिक।
Sonia Shukla
काश ऐसी दुआ किसी को ना करनी पड़े
Shweta Kumar
परिकल्पना और दृश्य रुला देते हैं
Tara Gupta
भावात्मक रचना
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