जिन्दगी

Sneh Bharti

जिन्दगी
(13)
पाठक संख्या − 60
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सारांश

1 एक जिन्दगी चांदनी सी जिसे लगा रहा हो ग्रहण... एक मुद्दत तक। जो मरती रही हो, कतरा - कतरा। अचानक जी उठे सूरज की एक छुअन से मानो बदल गए हों जीवन के अर्थ...।                    2 एक ...
nittu kumar
आपकी रचना की समीक्षा तो लिखने की ना मुझ में सामर्थ्य है ना मेरा स्तर परन्तु प्रतिक्रिया तो लिख ही सकती हूँ, मेरी यही सोच होती है आपके अद्भुत लेखन के लिए। (ये मेरा disclaimer है😁।)आपने ज़िन्दगी के तीन पड़ावों को बेहद खूबसूरती से लिखा है।महसूसने की पँक्तियाँ हैं!!!!! पहले पड़ाव में निराशा से फिर आशा उन्मुखता......दूसरे में, पूरी तरह घिस घिस कर जाया हो जाना टीसता है और अंतिम बंध तो पीड़ा,विवशता,क्षोभ ,पछतावा और हाथ खाली रह जाने की कसक की अभिव्यक्ति!!!!! ......जैसे गुम हो जाये उसका बच्चा.......गज़ब कल्पना की है👌👌👌👌👌👌 मेरी ही एक ग़ज़ल का शेर याद आया कि " सारी तमन्नाएँ दिल की,हसरतें बनकर रह गई/ मुद्दत से पाई मंज़िल ने ,जब खाली हाथ लौटाया है//" बहुत थोड़े शब्दों में बहुत बहुत गहरे भाव छिपा कर लिखने की आपकी प्रतिभा को नमन🙏🙏🙏🙏
Neelima Kumar
वाह बहुत खूब ...
fk bhati
क्या ख़ूब लिखा है
कविता
bahut acchi rachna hai
ईकराम पटेल
काफी अच्छा लगा स्नेह भारती भाई , उम्दा लेखन , उम्दा रचना
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R.K shrivastava
बहुत सुंदर !
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योगेश
very nice
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