जिन्दगी --- रेल की समानान्तर पटरी

मनोरंजन सहाय

जिन्दगी --- रेल की समानान्तर पटरी
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सारांश

एक प्रतिष्ठित हिन्दी लेखिका कथन है कि -- सामाजिक व्सयवस्था के अनुसार भारतीय नारी (खासतौर पर अल्प शिक्षित मध्यमवर्गीय औरतों को ) को अपने जीवन में सिर्फ आर्थिक और षारीरिक सुरक्षा के लियेे एक आदमी की जरुरत होती है और षारीरिक सुरक्षा के लिये तो हर वर्ग के हर समाज में जरुरत होती है,तथा अल्प शिक्षित मध्यमवर्गीय औरत अपनी षारीरिक,सामाजिक आर्थिक सुरक्षा प्राप्त करने के स्वार्थ में अन्धी होकर इसके प्रदाता उस आदमी- अपने पति के प्रति इस तरह पूर्णसमर्पित और कृतज्ञ रहती है कि इस कृतज्ञताज्ञापन के प्रयत्न में संतान और खास तौर पर पुत्री उसके परिवार के प्रति कर्तव्यों की प्राथमिकताओं में बेहद निचले पायदान पर पंहुच जाती है। वह खुद कभी आम भारतीय परिवार की पुत्री रही होने और उस रुप में अपना भोगा अतीत भूलकर अपनी पुत्री की सहृदय संरक्षिका बनने के स्थान पर अंग्रेजो के जमाने की जेलर बन जाती बन जाती है।
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