जाति एक्सप्रेस में बिना टिकट प्यार

शुभम

जाति एक्सप्रेस में बिना टिकट प्यार
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सारांश

इन सामाजिक प्रथाओं की वजह से आज फिर दो प्रेमी बलि चढ़ गये ,अक्षित का सवर्ण होना और कामिनी का सवर्ण ना होना ही इनके एक ना होने का कारण है , पहले तो अक्षित ने 8 साल तक इंतज़ार तो किया, अब तो वो इंतज़ार भी नहीं रहा, इस जातिबंधन की वजह से ही अक्षित और कामिनी बलि के बकरे बना दिये गये । और क्या कामिनी वहां अपने पति के साथ खुश रह पाएगी? क्या कभी अक्षित दुबारा किसी से मोहब्बत कर पाएगा? क्या प्यार को जातियों के तराजू में तौलना सही है? क्या ये प्रथाएं कभी ख़त्म हो पाएंगी?
Diya
kuch kuch mere life ke jaisa
Manisha
आपकी कहानी समाज की इस कुप्रथा पर एक प्रहार है...जिसमे संवेदना के साथ संदेश भी है। मेरी कहानी पिता के अवशेष जरूर पढ़े।
धनंजय यादव
मन को छू लेने वाली कहानी
Manish singh kshatriya
बहूत खूब लाजवाब
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Meenakshi Gupta
हमारे देश की एक ऐसी कड़वी सच्चाई जिसे शायद ही कभी ख़तम किया जा सके
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लेखा चौधरी
बहुत ही अच्छी और रियल कहानी है , ऐसी बेडियां हैं हमारर समाज मे की 2 प्यार करने वाले जुदा हो ही जाते हैं , फिर चाहे वो कितना ही रूहानी इश्क़ करते हो ।
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Asheesh shukla
good
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Kamlesh Kumar Rawat
ज्यादातर ऐसा ही होता है समाज में
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