"जलती जवानी चलता भिखारी-1(1)

Bhupendra Dongriyal

(26)
पाठक संख्या − 7007
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सारांश

भिक्षाम देई ! भिक्षाम देई । कहते हुए वह हर रोज की तरह आज भी सैकड़ों घरों के दरवाजे खटखटा चुका था । जवानी की उम्र में सुडौल शरीर पर गेरुआ जामा पहने जब से वह घर से निकला था तब से बीस वर्ष का समय निकल गया । भरी जवानी में शादी के तुरन्त बाद न जाने क्या सोच कर उसने एक दिन यह जामा पहना । घुँघराले काले केस अब जटाओं की शक़्ल में और अधिक उलझ गए हैं । जवानी में भरे हुए गालों पर रखी फ्रेंचकट दाढ़ी अब पूरे चेहरे को ढककर नाभि तक पहुँच गई है ।......
Madhusudan Goswami
nice story
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