जन्म-दिवस

सुमन सिन्हा

जन्म-दिवस
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सारांश

आया और दिनों सा एक दिन :यह भी ; सामान्य , पूर्व-निश्चित , प्रत्याशित / ...पर यह क्या , देखो / वह आया और गुज़रा , चला गया ले आयु का एक और वर्ष ! वनपाखी से उड़ते और गुज़रते ये दिन.. इस एक दिन में ही पूरे ...
Sanjeeva Kumar
eik aur bahot hi hridaysparshi kavita, mann mein chal rahe antardwand ki bahot hi achhi abhiwyakti, janmdivas ke bahaane jeevan ki sarthakta ki khoj.
ज्योति खरे
दिन यूं ही गुजरते जायेंगे  अतीत वर्तमान का साथ देता है और वर्मान भविष्य का यही जीवन चक्र है-- जीवन चक्र को खुबसूरत अंदाज में व्यक्त करती रचना  जन्मदिन तो जीवन जीने की गिनती है  बहुत सुंदर बधाई 
Anil Analhatu
सुमन जी की कविताओं का कैनवास हमेश बहुत बड़ा होता है । जन्म -दिवस पर बात करते  करते सुमन जीवन और मृत्यु की दर्शनिकता तक चली जाती हैं । जन्म दिन पर लिखी ऐसी तटस्थ  और निरपेक्ष कविता अन्यत्र नहीं दिखी। बड़े बेलौसपन से जन्म-दिन का आना और जाना देखती हैं , हर गुज़रा हुआ जन्म-दिवस भविष्य से एक वर्ष कम कर देता है औए अतीत मे एक वर्ष की वृद्धि हो जाती है ।  लेकिन कविता यहीं नहीं रुकती वह यह भी बताती है कि ......दिन यूँ ही गुजरते जायेंगे, और फिर ठहर जायेगा एक दिन .........!!।यह कविता तीव्र मृत्यु बोध की  कविता है, किन्हीं अर्थों मे अस्तित्ववादी भी।  मैं भी मुकेश सिन्हा जी की  तरह कवयित्री को सलाह दूंगा कि .... जन्मदिवस पर भी दर्द की तलाश ही क्यों, कवियत्री !! बी हैप्पी !! एंड ऑलवेज बी हैप्पी !!
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