जननी माँ# ओवुमनीया

Vandana Prasad

जननी माँ# ओवुमनीया
(52)
पाठक संख्या − 121
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सारांश

हे जननी माँ , तेरा आँचल कितना बड़ा है। जब जन्म दिया तुने मुझको, मैं आ गई इस धरा पर, बंद थे नन्हे दो नयन, पल पल सुरक्षा का एहसास हुआ, तेरे आँचल में। जब बड़ी हुई, तेरे आँगन में, गलतियां हर बार की, जब भी ...
Shourabh Prabhat
माँ पर लिखी गई किसी भी रचना की समीक्षा तो संभव ही नहीं है.... परंतु आपका लेखन उत्कृष्ट है... सस्नेह अभिनंदन..... कृपया अपने बहुमूल्य समय से कुछ क्षण मेरी रचनाओं को भी अवश्य देॉ
विक्रम शर्मा
यूँ तो माँ को शब्दों में परिभाषित करना उतना ही कठिन है जितना ईश्वर को परिभाषित करना। इस बहुत सुन्दर रचना के लिए बधाई एवं धन्यवाद।
Z
Z
very nice, meri bhi story padhiye
अरुण गौड़
maa or unka pyar sbse anmol h... bhut sunder rachna..👌👍
गजेन्द्र भट्ट
बहुत खूबसूरत कविता वन्दना जी! माँ के आँचल से सुखद जगह कोई और हो ही नहीं सकती। आपकी लेखनी ने उस सुख के अहसास को बयां करने में कमाल ही कर दिया है। इस रचना के लिए बधाई आपको!
sushma gupta
🤗बहुत प्यारी सी, सुंदर सी रचना🤗
SHAILENDRA DUBEY
ह्रदयस्पर्शी रचना!!!!मां को समर्पित एक प्रेममयी भावाभिव्यक्ति!!!!👏👏👏🌹🌹🌹👌👌👌 (मेरी रचना मां पर आपकी उपस्थिति प्रार्थनीय है🙏)
kuldeep singh
सुंदर इजहार।
Indira Kumari
वाह क्या ममता है माॅ के आंचल में बहुत सुन्दर 👍👍👍👍👍👍👍👍👍
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