चाहत

Kumar durgesh Vikshipt *Vaishnav*

चाहत
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सारांश

चाहत कुमार दुर्गेश "विक्षिप्त" तुम छोड़ दो ये दुनिया की रीति, क्यों हमसें दुर हो रहती, तुम हमसें इतनी चाहत करोगीं, शिव संग जैसे पार्वती रहती। कृष्ण राधा   के प्रेम में थी मिठास, हमकों भी तुम से थी ...
शशि कुशवाहा
bahut kubh
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Vijay Kumar Soni
अच्छी रचना
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भूपेन्द्र सिंह चौहान “राज़”
मात्रा सुधार करें,बहुत बढ़िया कविता, अति उत्तम
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sandeep parihar
bhut अच्छा
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Pankaj Pandey
Good poams
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Satpal. Singh Jattan
beautiful poem
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योगेश
very nice and beautiful
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Anita Hussain
Nice
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