चार घंटे

डॉ.प्रणव भारती

चार घंटे
(34)
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सारांश

वृक्ष की शाखों पर ताज़ी ,सुकोमल पत्तियाँ लहरा रही थीं। अच्छी लग रही थी कोमल,सुरभित बयार !उसने एक चक्कर पूरे बगीचे का काट लिया था और अब वह थक गया था । वैसे थकना उसके स्वभाव में नहीं था फिर भी शरीर है ...
Aakash Thoriya
बहुत अच्छा कृपया मेरी कविताओं को एक बार जरूर पढ़ें
Sunny Kansykar
time waste😡😡
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sunitakhokha
अच्छी कहानी
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शिल्पी रस्तोगी
सधी हुई कहानी ...
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JAWAHAR LAL SINGH
उत्तम
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dr.ashwini Shukla
बहुत सुंदर , सहज अभिव्यक्ति व यथार्थ
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روبین خان
Very nice
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Meena Bhatt.
good
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Rashmi Verma
Good people can meet any stages of life and life get new meaning for next chapter.I liked it by heart?
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मधु सोसी
"चार घंटे " पढ़ने में तो शायद चार मिनिट लगे परन्तु बात चार सौ मील तलक पहुँच गई , आशान्वित करती प्यारी कहानी मधुर सन्देश ठीक ऐसे पहुंचाती है जैसे तामस से लड़ता, अब बुझा अब बुझा दीप | " ये कहानी है दिए की और तूफ़ान की " डा. प्रणव भारती की  सूक्ष्म ,महीन ,जहीन लेखनी ने सूर्य रश्मि को बखूबी पन्नों पर बिखेरा  है | उनका शब्द चित्र सराहनीय है सबसे बड़ी बात है की जमीनी हकीकत , विद्रूप परिस्तिथि जिसमे प्रोफैसर गौड़ अपने को पाते है और टूट जाते है ऎसी  दमघोटू , वन्तिलेटर पर जीते व्यक्ति की साँसों में  स्पंदन भरना उनका प्रतिपल विफलताओं का मातम मनाना , और समीरा का उन्हें उन चंद घंटों में ऐसे दर्शन से मिलवाना जिसे वे पढ़ाते तो अवश्य रहे किन्तु  जीवन शैली में उतारने में विफल रहे , बस यहीं मैं प्रणव की कायल हो गई | बधाई प्रणव  आपने दिल से लिखा हमने दिल से पढ़ा और दिल पर लिखा , सन्देश सभी के लिए है , और ये ही एक  लेखक का यज्ञ है | मधु  
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