चार घंटे

डॉ.प्रणव भारती

चार घंटे
(42)
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सारांश

वृक्ष की शाखों पर ताज़ी ,सुकोमल पत्तियाँ लहरा रही थीं। अच्छी लग रही थी कोमल,सुरभित बयार !उसने एक चक्कर पूरे बगीचे का काट लिया था और अब वह थक गया था । वैसे थकना उसके स्वभाव में नहीं था फिर भी शरीर है ...
Rajkumari Mansukhani
nisabd hoon kaya likhoo saare ke saare vigyan isme hai v v nice ,and multitype information s thanks for unique story
Navin Rathod
वर्तमान राजनैतिक और सामाजिक कुरीतियों पर बहुत ही सुंदर तरीके से प्रहार है, नीर्रंतर प्रयाश करते हुऐ एक आशा की जो कीरण हमेशा जलती रहनी चाहिऐं ऊश दिशा में इश लेख में कीया गया प्रयाश पुरी तरह सफल साबित हुआ हैं.अंत मै यह लेख नीःशब्द है, प्रेरणादायक है.
Meera Parihar
अच्छी शुरूआत
Archana Varshney
बहुत अच्छी
Aakash Thoriya
बहुत अच्छा कृपया मेरी कविताओं को एक बार जरूर पढ़ें
Sunny Kansykar
time waste😡😡
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sunitakhokha
अच्छी कहानी
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शिल्पी रस्तोगी
सधी हुई कहानी ...
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JAWAHAR LAL SINGH
उत्तम
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