चांद डरावना लगता है..??

मोनिका त्रिपाठी

चांद डरावना लगता है..??
(16)
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सारांश

सोचा मैंने छत पर जाकर, मेरे चांद से मिल लूं, कुछ घड़ियों का सुकूं चुराकर दो बातें मन की भी कर लूं, तय कोने पर पहुंची पर वो वहां नहीं था, पीछे मुड़ के देखा तो वो समझ सा आया, आज पश्चिम से निकला था ...
संजीव साहिब
कुछ गहरा दिल मैं दबा कर घूम रहे हो . उसे शब्दों मैं बयान करने की कोशिश अच्छी है
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Prakash Tiwari
बहुत खुब।
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सन्दर्भ मिश्र
Awesomeness in precise use of rhymes. Really a great try. All the BEST. तुकबन्दी का उत्तम व सीमित प्रयास अच्छा है पँक्तियों में महोदया।
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Vrushabh Mahankar
बहुत बढ़िया
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Mr. Bonshie 'आदित्य'
बहुत खूब
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Awadhesh kumar Shailaj
आज भी जब किसी चाँद को अपने चाँद के रूप में स्वीकार कर लिया जाता है तो वह अपना चाँद हो जाता है। हमें अपनापन को अपनी ओर से भी भरने का प्रयास करना चाहिए, लेकिन दूसरे के चाँद का तो डरावना लगना स्वाभाविक ही है। मोनिका त्रिपाठी जी की रचना " चांद डरावना लगता है..?? " वास्तव में सुन्दर सलोना चांद भी कभी-कभी सोचने के लिए मजबूर कर देता है।
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धरा अर्की
bahut khoobsurat likha hai apne.
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कवी विजय पराते
👌👌👌👌👌
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