चंचल मन

Meenakshi Gupta

चंचल मन
(13)
पाठक संख्या − 58
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सारांश

ज़िंदगी में आगे बढ़ना चाहती हूँ    सब कुछ भूलना चाहती हूँ पुराने लम्हों को भुला   नए लम्हे   यादगार बनाना चाहती हूँ   खुशियों को ढूंढ़ने के बजाये हर लम्हा खुशगंवार बनाना चाहती हूँ    ज़िंदगी का ...
Samta Parmeshwar
"यूं ही भटकते भटकते...शेष कुछ बचता नहीं" बेहद खूबसूरत पंक्तियां हैं जिनमें जीवन का सार उतार दिया है आपने। बहुत अच्छी कविता लिखी है।
Seema Maurya
भावनात्मक रचना
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Asha Shukla
बेहद खूबसूरत रचना!!!👌👌💐💐
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Aradhana Aru
बहुत बढ़िया
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Bhanupriya Sharma
Good
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Sagar
जो चाहा वो मिलता नहीं... सही कहा आपने.. एक ओर खूबसूरत रचना.....,
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Nisha Thakur
अति सुन्दर 👌
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Dr. Santosh Chahar
जिंदगी का दस्तूर यही है।
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