घरोंदा

मोनिका गुप्ता

घरोंदा
(22)
पाठक संख्या − 4900
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सारांश

रमला की जिंदगी तो पहले ही खराब थी परन्तु जब से आशा आयी तो उसकी जिंदगी नरक ही बन गई
गुमान
bahut hi bekar, aapka najariya thik hona chahiye, tabhi kahani acchi ho payegi!
आकाश इफेक्ट
आलोचना से परेशान होना या आलोचना को बुरा समझना समझदारी नही। आलोचनाओं से सबक लेते हुए और बेहतर प्रयास करना ही समझदारी होती है। स्वर्ण को तब तक जलाया जाता है जब तक वो पूर्ण शुद्ध नही होता। आपकी आलोचनाएं ही आपको खरा सोना बनाने में सहयोग देंगी। आलोचनाओं को सकारात्मक तरीके से लीजिये एवं उनमें बताई गई कमियों को दूर करने का प्रयत्न कीजिये। अब आते हैं इस कथा पर... कथा को व्याख्यान में मत बदला कीजिये। कथा को उसके मूल स्वरूप में रखने से उसकी सुंदरता बनी रहती है। संवादों का कथा में विशेष महत्व होता है। कथा में संवादों की भूमिका कथा का स्तर बढ़ाती है। संवाद ही हृदयस्पर्शी होते हैं एवं साधारण कथानक को विशेष कथा में बदलने को सक्षम होते हैं। भविष्य में संवादों पर अवश्य ध्यान दीजियेगा। विषय ऐसा चुनिए जिस पर भावनात्मक दबाव बनाया जा सके। रमला के जीवन में ऐसा संभव हो सकता था पर आप चूक गयी। राजेश को निकृष्ट दिखाने के फेर में आप रमला के चरित्र को उभार नही पायी। आशा, मकान मालिक की पुत्री गीता एवं अन्य स्त्रियों के चरित्र को उभारना मात्र कथानक को लम्बा एवं उबाऊ बनाता है। राजेश के अन्य स्त्रियों के साथ अनैतिक संबंध थे मात्र इतने से ही काम चल जाता। अंत भी अति साधारण रहा। राजेश को सबक मिलना चाहिए था। रमला आत्मनिर्भर थी एवं एक पुत्र भी उसके साथ था। राजेश को अपने कर्मों का दण्ड भुगतने के लिए उसे अकेला छोड़कर यदि रमला चली जाती तो अंत बेहतर हो सकता था। सुखांत बनाने के लिए कथावस्तु से समझौता न करें वैसे भी वास्तविक जीवन में भी सब कुछ सुखांत नही होता। परीकथा की बात अलग होती है। प्रतिलिपि पर पाठक उच्च श्रेणी के हैं वो परीकथा पर विश्वास नही रखते। बेहतर होगा कि लिखने के साथ आप अधिक से अधिक लोगों को पढ़ने का प्रयास भी करें इससे आप स्वयं की कमियों को जानकर और बेहतर लिख सकेंगी। आशा है आप से एक ✡✡✡✡✡ कहानी शीघ्र ही पढ़ने को मिलेगी। बेहतर लेखन की शुभकामनाओं सहित। 🙏🙏🙏
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धर्मेंद्र विश्वकर्मा
कहानी ओपन नहीं हो रही है .......?
Charanjeet Kaur
Bekar .Koi sense nai hai
Dev Sighania
kya bat h Acha likha h
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