गुमनाम बन जाऊं

पिया सिंह

गुमनाम बन जाऊं
(89)
पाठक संख्या − 2322
पढ़िए

सारांश

इश्क़ के कई रूप होते हैं
Aashu thakur
मेरे को तो अभी तक समझ नहीं आया गुमनामी में ही क्यूँ जाता है मन शायद हम गुमनामी में अपने करीब होते है क्या पता मुझे नहीं पता,.... कुछ भी हो आपने लिखा सही है
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Tanuja
खुबसूरत रचना
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गायत्री मोहनी
Bahut achachhaa.
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sudhanshu Jha
very nice..👌👌
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Damini
बहुत खूबसूरत पंक्तियाँ लिखीं है आपने
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Neerja Malhotra
सुंदर अभिव्यक्ति
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Rahul Avinash
bahut bahut bahut sundar rachna.....
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shubham goutam
उत्तम अति उत्तम
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Teri Jogan
achi lggi
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ANKUR TRIPATHI
बेहतरीन लेख ...
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