गुब्बारेवाला

संजीव जायसवाल ' संजय '

गुब्बारेवाला
(54)
पाठक संख्या − 2790
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सारांश

,‘‘बाबूजी, मैं बेसहारा जरूर हूं । मगर भिखारी नहीं ।’’ ‘‘मेरा यह मतलब नहीं था । मैं तो सिर्फ तुम्हारी मदद करना चाहता था ’’ मैनें बात संभालने की कोशिश की । उस लड़के ने पल भर के लिये मेरी ओर देखा फिर बोला,‘‘अगर आप मदद करना चाहते हैं तो सिर्फ इतना वादा कर दीजये कि आज के बाद किसी गरीब को दुत्कारेगें नहीं ।’’
मनीषा
खुप छान गोष्ट आहे
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ओम प्रकाश क्षत्रिय
बहुत ही बढ़िया मन को छू लेने वाली कहानी । हार्दिक बधाई शानदार कहानी के लिए ।
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Sudha Jugran
आपकी छोटी छोटी कहानियाँ कुछ भूली बिसरी बातें याद दिला देती हैं । कुछ ही साल पहले की बात है, रात में कहीं से लौटते हुए एक जगह पर कार खड़ी होने के कारण एक गुब्बारे वाला बच्चा आकर करूण शब्दों में गुब्बारे खरीदने का आग्रह करने लगा। वह भूखा और दयनीय लग रहा था । रात भी काफी हो गई थी। गुब्बारे बिकने का अब कोई चांस नहीं था। कुछ सोचकर मैंने उसके गुब्बारों का पूरा बंच खरीद लिया। अब उसे घर लाने की मुश्किल थी जिसके लिए मैं डांट भी खा रही थी । कार की खिड़की से एक हाथ बाहर रख किसी तरह मैं उस बंच को घर लाई और अपने आउट हाउस में रहने वाले परिवार के बच्चों को दे दिया । एक साथ इतने सारे गुब्बारे देखकर वे बच्चे भी खुश हो गये। और एक साथ 3, 4 बच्चों को खुश करके मैं भी खुश हो गई थी। बहुत खूबसूरत बालकहानी संजीव जी । आजकल यहाँ की भीषण ठंड और बारिश....और आपकी कहानियाँ ....लुत्फ ही आ जाता है पढ़ने का।
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Soni Sonwani
very nice story
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Santosh Bhawal
good one
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baidya jayaswal
good
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swaraj singh
यह कहानी स्वाभिमान से जीने की सीख देती है। मनुष्य को जीवन में परिश्रम करना चाहिए। किसी की दी हुई भीख फौरी लाभ तो दे सकती है परंतु वह हमारी आत्मा को मार देती है। जीवन में अपने परिश्रम के बल पर ही आगे बढ़ा जा सकता है।
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Arif Ahmed Khan
दिल को छूने वाली कहानी👍
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नीलम मधुर कुलश्रेष्ठ
बहुत ही मार्मिक और संदेशात्मक कहानी।
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अरविन्द सिन्हा
hrìďayasparshi .
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