गीता

बृजभूषण खरे

गीता
(83)
पाठक संख्या − 815
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सारांश

सब   धर्मों  का  सार,  हरे भय  ऐसी शीतल छाया गीता ने   कर्तव्य   मार्ग  पर  चलना   हमें  बताया महाग्रंथ का  "भीष्म पर्व"  ये  मोक्षद्वार दिखलाता मत सोचो फल कर्म करो बस यही हमें सिखलाता कौंतेय   जब  ...
Priyanka Sharma
आदरणीय बृजभूषण जी, कलयुग का सत्य है गीता, जिसे आपने रूप दिया है. आपकी रचना वाकई प्रशंसायोग्य है. मैं शब्दनगरी पर भी लिखती हूँ, आपको बताना चाहती हूँ की आप वहाँ पर भी अपने लेख प्रस्तुत करें, बहुत से पाठक वहाँ भी आपकी रचना को पढ़कर आनंदित होंगे, इसी आशा से आपसे ये निवेदन कर रही हूँ. यदि मेरी सहायता की आवश्यकता हो तो मुझे प्रतिउत्तर में अवश्य बताएं। शब्दनगरी पर अकाउंट बनाने के लिए लिंक shabd.in लिख के अकाउंट बनाए और अपना लेख ज़रूर प्रकाशित करें।
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मीरा परिहार
बहुत अच्छी रचना
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सुनील पवार
सर् जी आप की रचना बहोत अछि है
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मोहित तिवारी
बहुत सुन्दर रचना गीता को कविता के माला में पिरो दिया आपने।बधाई।।
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Sandhya Bakshi
सुंदर पाँच पद्य रचना में , गीता सार लिपिबद्ध किया । अनुपम ! शब्दशिल्प उत्कृष्ट ! शुभकामनाएं सर जी ।
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bhagirath choudhary
very very very nice
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मल्हार
बहुत ही उच्चकोटि का लेखन👏👏👏🙏🙏🙏💐💐💐
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अनुपमा झुनझुनवाला
आपको और आपकी लेखनी को मेरा शत-शत नमन है सर🙏🙏🙏गीताजी जैसे महान ग्रंथ को आपने इतनी खूबसूरती के साथ आकार दिया है ...वाकई प्रशंसनीय है 👏👏👏👏👏
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Kalyani Jha
बहुत ही अच्छी बहुत ही सुंदर रचना 👌👌
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Subhash Shrivastava
अल्फ़ाज गुम हैं।आपकी रचना पढ़ने के बाद। गीता का सटीक चित्रण जय श्रीकृष्ण🙏 sir
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