गंध

तेजेंद्र शर्मा

गंध
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सारांश

“ओए! तुझे नहीं पता... इन नीची जात वालों के बदन से एक अलग किस्म की बू आती है।… हमारे घर में भला यह लड़की कैसे अपने आप को एडजस्ट कर पाएगी ?”“पापा, आप कैसे इस तरह की बातें सोच लेते हैं ? अरे... भूमि मेरी
Santosh Nayak
बिषय के साथ न्याय/विचार सराहनीय
ajay
क्या खूब!!!!गौर करें कि विवेक के पिता की सोच कब भूमि की बन गई।
Archana Varshney
बहुत सुंदर रचना
Uday Pratap Srivastava
एक अच्छी कहानी
Ajit
Sharma ji , गंध को उड़ाया क्यों नहीं । आपने गंध को जकड़ के रखा ये बड़ा अज़ीब लगा ।
prabha malhotra
कहानी ने बांध के रखा
Premita Mathur
This is the fact of our society.
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