गंध

तेजेंद्र शर्मा

गंध
(141)
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सारांश

“ओए! तुझे नहीं पता... इन नीची जात वालों के बदन से एक अलग किस्म की बू आती है।… हमारे घर में भला यह लड़की कैसे अपने आप को एडजस्ट कर पाएगी ?” “पापा, आप कैसे इस तरह की बातें सोच लेते हैं ? अरे... भूमि ...
sakshi sabnam
wow 👏👏👏👏👍.
Santosh Bharti
last me kuch theek nhi tha but overall bahut achi hai
SAMIDHA -The Realization
बहुत बढ़िया कहानी ।बधाईयाँ स्वीकार कीजिए ।
Mamta Upadhyay
बहुत सुंदर रचना👌
Santosh Nayak
बिषय के साथ न्याय/विचार सराहनीय
ajay
क्या खूब!!!!गौर करें कि विवेक के पिता की सोच कब भूमि की बन गई।
Archana Varshney
बहुत सुंदर रचना
Uday Pratap Srivastava
एक अच्छी कहानी
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